आत्मनिर्भर भारत अभियानः संवृद्धि आवेग की आगामी तरंग की ओर लक्षित

चंडीगढ़, पीईबी न्यूज़: भारतीय उद्योग व अर्थ-व्यवस्था पर कोविड-19 के स्पष्ट तौर पर बढ़ते जा रहे प्रतिकूल प्रभाव के चलते ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ एक गुंजन बन कर उभरा है। विश्व-स्तरीय महामारी ने व्यवसायों व रोज़गार की संवहनीयता व निरंतरता हेतु कई प्रकार की उलझनें उत्पन्न कर दी थीं, जिसके कारण लोगों का विश्वास पुनः जगाने के लिए कुछ प्रमुख कदम उठाने आवश्यक हो गए थे, यह अभियान ऐसा करने का वायदा करता है।

भारत हेतु पीएमआई (PMI) के अनुसार, आर्थिक गतिविधि मन्द गति से चल रही है, मार्च 2020 के दौरान निर्माण क्षेत्र में संवृद्धि चार माह में सब से कम दर्ज हुई थी। सीआईआई (CII) के एक अध्ययन अनुसार भारत का कुल घरेलू उतपादन (GDP) वर्तमान वित्तीय वर्ष में -0.9 प्रतिशत व $ 1.5 प्रतिशत के बीच रहने की संभावना है ‘ जो कि सचमुच चिंता का विषय है! विश्व अर्थ-व्यवस्था की बात करें, तो अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुमान अनुसार इसमें वर्ष 2020 के दौरान 3 प्रतिशत तक का तीखा संकुचन देखने को मिल सकता है, जो कि 2008-09 के वित्तीय संकट से कहीं अधिक बुरी स्थिति है।
समस्त विश्व के विभिन्न देशों ने इस गंभीर प्रकार की आर्थिक चुनौती का सामना करने हेतु वित्तीय पैकेज घोषित किए हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) ने अपने कुल घरेलु उत्पादन (जीडीपी) के 13 प्रतिशत के समान एक वित्तीय पैकेज की घोषणा की है, जबकि जापान का ऐसा पैकेज उसके कुल घरेलु उत्पादन (जीडीपी – GDP) के 21 प्रतिशत से भी अधिक है। इसी बात को समझते हुए तथा कुछ प्रमुख क्षेत्रों को तत्काल सहायता की आवश्यकता है, भारत सरकार ने भी 20 लाख करोड़ रुपए मूल्य के एक वैसे ही आर्थिक पैकेज की घोषणा की है, जो कि देश के कुल घरेलु उत्पादन के 10 प्रतिशत के समान है। इस पैकेज को ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ का नाम दिया गया है, तथा इसका उद्देश्य क्षतिग्रस्त अर्थ-व्यवस्था के पुनरुत्थान हेतु आवश्यक प्रोत्साहन प्रदान करना है, क्योंकि राष्ट्र ने अब अपनी ’नई सामान्य’ संवृद्धि की ओर छोटे कदम उठाने प्रारंभ कर दिए हैं।

हम देखते हैं कि इस व्यापक पैकेज में वह सभी प्रमुख तत्त्व विद्यमान हैं, जो देश की विकासात्मक यात्रा को एक ताज़ा गति-शक्ति प्रदान कर सकते हैं। इसमें न केवल उद्योगों के सभी वर्ग समाविष्ट हैं, अपितु इस की संरचना समाज के भी सभी वर्गों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में भी सक्षम है।

कइस पैकेज की प्रथम किस्त की घोषणा 13 मई को माननीय केन्द्रीय वित्त मंत्री ने की थी, जिसमें छोटे व्यवसायों, छाया बैंकों तथा संकट में चल रहीं विद्युत वितरण कंपनियों को ऋण उपलब्ध करवाना सम्मिलित है। इसने रीयल एस्टेट व भवन-निर्माण हेतु भी अत्यावश्यक राहत प्रदान की है। हमारे विचारानुसार पूर्णतया सरकारी गारण्टी के साथ 3 लाख करोड़ रुपए मूल्य के कोलेट्रल-फ्ऱी ऑटोमैटिक लोन्स इस समय तनाव में चल रहे ‘सूक्षम-लघु व मध्यम उद्यमों’ (एमएसएमईज़ – MSMEs) को निश्चित तौर पर बड़ी राहत प्रदान करेंगे। वास्तव में सीआईआई (CII) ऐसे सुधार लाने की बात करती रही है, जिससे बैंक उन एमएसएमईज़ (MSMEs) को वित्तीय सहायता उधार देने हेतु उत्साहित हों, जो अपने कर्मचारियों की नौकरियों को बचाने के लिए अपने आप्रेशन्स पुनः प्रारंभ कर सकें।

इस पैकेज ने एमएसएमई की परिभाषा परिवर्तित करने की हमारी पुरानी सिफ़ारिश को भी मान लिया है, जिससे आकार की मदों में उनकी टिकाऊ वृद्धि सुनिश्चित हो सकेगी। हमें टर्नोवर पर आधारित एमएसएमई क्षेत्र हेतु परिभाषा में प्रस्तवित परिवर्तन भी एक प्रगतीशील कदम लगता है, जो कि जीएसटीएन संरचना के पूर्णतया अनुरूप है। अब समय है कि इस विधेयक को शीघ्रतया क्रियान्वित किया जाए।

वर्तमान चुनौतीपूर्ण परिदृश्य में, तीन माह हेतु वैधानिक पीएफ़ (PF) में 12 प्रतिशत से 10 प्रतिशत की कमी द्वारा उपभोक्ताओं व व्यवसायियों के हाथों में तरलता (लिक्वीडिटी) प्रदान करने का प्रस्ताव एक अन्य महत्त्वपूर्ण सकारात्मक कदम है। इससे कर्मचारियों के हाथों में अधिक वेतन आने का अनुमान है व उन्हें तरलता मिलेगी – जो कि इस परिस्थिति में अत्यंत आवश्यक है।

तनाव में चल रहे एनबीएफ़सी (NBFC) क्षेत्र हेतु विशेष व आंशिक ऋण गारण्टी योजनाओं के रूप में लिक्वीडिटी सुगम बनाने हेतु उपायों से अर्थ-व्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों को ऋण देने सरल होंगे। इस सुविधा से 2 लाख एमएसएमईज़ (MSMEs) को ऋण आवश्यकता की पूर्ति का लाभ मिलने की संभावना है। सीआईआई का मानना है कि इन पहलकदमियों से भारत में अवश्य ही खपत/उपभोग व मांग में बढ़ोतरी होगी, जिनमें पिछले कुछ समय से कोई कार्यवाही नहीं हो रही थी।

भारत सरकार की 200 करोड़ रुपए तक की ख़रीद में विश्व-स्तरीय निविदाओं की स्वीकृति न देने से तथा केन्द्रीय व राज्य के एमएसएमईज़ (MSMEs) की बकाया राशियों को 45 दिनों के भीतर मिलना सुनिश्चित करने व कुछ अन्य प्रमुख पहलकदमियों से एमएसएमई (MSME) की प्रतियोगितामिक्ता व उनके नगद-प्रवाह में मज़बूती आएगी।

प्रोत्साहन पैकेज में कृषि को दिया गया महत्त्व भी वर्णनयोग्य है। अत्यंत सजग रह कर की गईं इन कार्यवाहियों, जैसे 31 मई, 2020 तक 3 माह के लिए ब्याज सबवैंशन का विस्तार तथा 25 लाख नए किसान क्रैडिट कार्डस को संस्थागत ऋण देने की अनुमति देने से कृषक वर्ग लम्बे समय के लिए सशक्त होगा। ऐसे उपायों से आने वाली ख़रीफ़ की फ़सलों हेतु तैयारियों सहित कृषि गतिविधियों की निरंतरता सुनिश्चित होगी। इन कदमों से अतयंत असुरक्षित छोटे व सीमांतक किसानों को लिक्वीडिटी मिलने से सहनशीलता का निर्माण भी होगा।

2 लाख करोड़ रुपए के ऋण प्रवाह कवरेज द्वारा 2.5 करोड़ अतिरिक्त किसानों को कवर की छत्रछाया के विस्तार तथा मछुआरों व पशु-पालक किसानों को किसान क्रैडिट कार्डों के घेरे में सम्मिलित करना अन्य स्वागतयोग्य पहलकदमियां हैं, जो इस क्षेत्र के हमारे समर्थन के अनुरूप हैं। आधारभूत संरचना लौजिस्टिक्स तथा कृषि, मतस्य पालन व फ़ूड प्रोसैसिंग क्षेत्रों हेतु क्षमता निर्माण को सशक्त बनाने के उपाय देश में सस्ती व वित्तीय तौर पर व्यवहारिक पोस्ट हारवैस्ट प्रबन्ध आधारभूत संरचना को और बल प्रदान करेगा।

आवश्यक वस्तुओं संबंधी अधिनियम संबंधित सुधारों से किसानों को अपनी फ़सलों की अच्छी कीमत मिल पाएगी, जबकि कृषि विपणन सुधार उन्हें लाभदायक कीमतों पर अपनी उपज बेचने हेतु उपयुक्त विकल्प प्रदान करवाएंगे। अवरोध-मुक्त अंतर-राज्य व्यापार तथा कृषि पैदावार के ई-व्यापार हेतु संरचना से उन्हें बेहतर विपणन विकल्प मिलेंगे।

भारत सरकार का पैकेज ‘मगनरेगा’ के अंतर्गत अतिरिक्त कार्य-दिवसों द्वारा कामगारों के कल्याण तथा शहरी कर्मचारियों हेतु सस्ते आवासीय स्थान उपलब्ध करवाने हेतु भी तैयार किया गया है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के अंतर्गत आने वाले प्रवासी परिवारों हेतु कम कीमतों पर अनाज तक पहुंच हेतु पोर्टेबिलिटी को योग्य बनाने से लगभग 67 करोड़ लाभार्थियों को तत्काल लाभ होगा तथा इससे रोज़गार हेतु कर्मचारियों को आवागमन की सुविधा मिलेगी। इसके साथ ही ग़ैर-कार्ड धारक प्रवासियों को दी गई कवरेज सभी को पूर्णतया सम्मिलित करने की पहुंच है, जिसके दीर्घकालीन सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे।

लाल फ़ीताशाही से उत्पन्न होने वाली अड़चनों के कारण प्रत्येक मंत्रालय में एक ‘परियोजना विकास प्रकोष्ठ’ (प्रोजैक्ट डिवैल्पमैन्ट सैल) स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है, जो निवेश-योग्य परियोजनाएं तैयार करेगा तथा निवेशकों तथा केन्द्र व राज्य सरकारों के साथ तालमेल बिठाएगा, एक अत्यंत सराहनीय कदम है। हम यह भी महसूस करते हैं कि आठ महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में संरचनातमक सुधार ; प्रतियोगिता, पारदर्शिता तथा निजी क्षेत्र की अत्यावश्यक भागीदारी में सहायक होंगे।

अंत में और अधिक उदारीकरण से अर्थ-व्यवस्था के रक्षा व प्रमाणु ऊर्जा जहैसे अन्य प्रमुख क्षेत्र भी खुलेंगे। प्रस्तावित सुसंगत नई नीति, जिसमें सभी क्षेत्र निजी क्षेत्र हेतु खुले रखे गए हैं, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम भी परिभाषित क्षेत्रों में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे तथा इससे भारत में संवृद्धि की कहानी की रूप-रेखाओं में एक सकारात्मक काया-कल्प सुनिश्चित होगा।