आधुनिक जीवन के दोगलेपन और निरंतर बढ़ते अलगाव को दर्शाता TFT ग्रुप का चिड़ियाघर नाटक

चंडीगढ़: हम इक्कीसवी शताब्दी मे रेहते हैं जहां ये दुनिया वैशवीकरण और सभ्यता के चरम पर है। ऊपरी सतह पे हम एक बहु सांस्कृतिक समाज के नागरिक हैं जिसमे विविध व्यक्तित्वों के लिए समान स्थान होना चाहिए। लेकिन इस बनावटी सतह के नीचे वही पुराने समाजिक अंतर आज भी उपस्थित हैं जो एक व्यक्ति को सम्पन्न सम्पूर्ण व सुरक्षित बनाते हैं और दूसरे को बेरोज़गार गरीब और असहाय।

चिड़ियाघर आधुनिक भारत के एक महानगर मे रेहने वाले दो ऐसे ही नागरिकों की कहानी है जिनकी मुलाक़ात अकस्मात् ही शहर के पोष इलाक़े मे स्थित एक पार्क मे हो जाती  है। प्रकाश जो की विवाहित है एक अच्छे पद पर कार्यरत है दो बचियों का पिता है और आर्थिक समाजिक रूप से स्थिर और सुरक्षित है। और जय जो की बेरोज़गार है अकेला है और आर्थिक रूप से अस्थिर है। जय जीवन के उन अस्तित्व वादी प्रश्नों से जूझ रहा है जिनके बारे मे  सोचने की प्रकाश को ना तो फ़ुर्सत है और ना ही कोई आवश्यकता।

ज़बर्दस्ती शुरू हुआ वार्तालाप दोनो किरदारों की ज़रूरतों और अभावों को व्यक्त कर्ता हुआ एक बेंच के लिए द्वन्द मे कब परिवर्तित हो जाता है पता ही नहीं चलता। आधुनिक जीवन के दोगलेपन और निरंतर बढ़ते अलगाव को ये नाटक बखूबी उभारता है।