उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, पटियाला (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार) के सौजन्य से बहुभाषी व साहित्यकार शहीद रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ जी के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में एक विशेष ऑनलाईन शब्द-सुमन समारोह

चण्डीगढ़: 21 जून, 2020: उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, पटियाला (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार) के सौजन्य से आज आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनवादी महाकवि, कहानीकार, निबन्धकार एवं उपन्यासकार बाबा नागार्जुन जी एवं क्रान्तिकारी कवि, शायर, अनुवादक, बहुभाषाभाषी व साहित्यकार शहीद रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ जी के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में एक विशेष ऑनलाईन शब्द-सुमन समारोह, सेमीनार एवं कवि सम्मेलन का आयोजन साहित्यकार डा. सुशील ‘हसरत’ नरेलवी की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। मंच संचालन कवियित्री उर्मिला कौशिक ‘सख़ी’ ने किया।
शहीद रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए डा. सुशील ‘हसरत’ नरेलवी ने कहा कि ‘‘11 जून, 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर शहर के खिरनीबाग मुहल्ले में जन्मे रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ महान् देशभक्त, अटूट साहसी स्वतन्त्रता सेनानी, आला शायर, अनुवादक, बहुभाषाभाषी साहित्यकार थे। उनके जीवन काल में उनकी 11 पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें से अधिकतर सरकार द्वारा ज़ब्त कर ली गयीं। उन पुस्तकों को बेचकर जो पैसा मिला उससे उन्होंने हथियार खरीदे और उन हथियारों का उपयोग ब्रिटिश साम्राज्य का विरोध करने के लिये किया।’’
तत्पश्चात कवयित्री उर्मिला कौशिक ‘सख़ी’ ने शहीद रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की ग़ज़ल ‘‘बला से हमको लटकाए अगर सरकार फाँसी से, लटकते आए अक्सर पैकरे-ईसार फाँसी से’’; वीरेन्द्र शर्मा ‘वीर’ ने ‘बिस्मिल’ की ग़ज़ल ‘‘देश हित पैदा हुए हैं देश पर मर जायेंगे, मरते मरते देश को ज़िन्दा मगर कर जायेंगे’’; सुशील ‘हसरत’ नरेलवी ने ‘बिस्मिल’ की ग़ज़ल ‘‘सरफ़रोसी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है’’; राजन सुदामा ने ‘बिस्मिल’ का गीत ‘‘हैफ़ हम जिसपे कि तैयार थे मिट जाने को, यक-ब-यक हमसे छुड़ाया उसी काशाने को’’ तो सुनील बरवालवी ने ‘बिस्मिल’ की ग़ज़ल ‘‘क़ौम पर कु़र्बान होना सीख लो ऐ हिन्दियो, ज़िन्दगी का राज़े-मुजि़्मर ख़ंजरे-क़ातिल में है’’, सुनाकर युवाओं को देशभक्ति का संदेश देते हुए ख़ूब वाहवाही बटोरी।
बाबा नागर्जुन के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए वीरेन्द्र शर्मा ‘वीर’ ने कहा कि ‘‘30 जून, सन् 1911 को बिहार के मधुबनी ज़िले के ’सतलखा गाँव’ में जन्मे बाबा नागार्जुन ‘हिन्दी’ और ‘मैथिली’ के अप्रतिम कवि थे। वे सन् 1929 से 1997 तक रचनाकर्म से जुड़े रहे। कविता, उपन्यास, कहानी, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, निबन्ध, बाल-साहित्य विधाओं में उन्होंने कलम चलाया। औपन्यासिक कृतियों में जनपदीय संस्कृति और लोक जीवन उनकी कथा-सृष्टि का चैड़ा फलक है। कवि की हैसियत से नागार्जुन प्रगतिशील और एक हद तक प्रयोगशील भी हैं।’’
तत्पश्चात पानीपत से कवियित्री सुनैना ‘मीत’ ने नागार्जुन की कविताएं ‘आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी’ तथा ‘बादल को घिरते देखा है’; कवि कृष्ण कान्त ने नागार्जुन की कविताएं ‘‘प्रतिबद्व हूँ, संबद्व हूँ, आबद्व हूँ’’ तथा कविता ‘मोर न होगा….उल्लू…होंगे; कवि लवेष ‘रघू’ ने नागार्जुन की कविताएं ‘‘इन्दुजी क्या हुआ आपको’’ तथा ‘शासन की बंदूक’ एवं कवयित्री सविता ‘सावी’ ने नागार्जुन की कविताएं ‘सच न बोलना’ तथा ‘कालिदास’, सुनाकर श्रोताओं को भावविभोर कर उनकी खूब तालियाँ बटोरीं।
अन्त में, डा. सुशील ‘हसरत’ नरेलवी ने अध्यक्षीय व्यक्तव्य में अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि महाकवि बाबा नागार्जुन एवं स्वतन्त्रता सेनानी व आला शायर रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ जैसे साहित्यकार व क्रांतिकारी सदियों में जाकर पैदा होते हैं। इनकी रचनाएं व देशहित में इनका अमूल्य बलिदान हमेशा नई पीढ़ी का मार्ग प्रशस्त रहेगा।