उम्र की दहलीज़ पर रह जाती है – तन्हाई

चंडीगढ़ (शालू चोपड़ा, अध्यापिका): “मिस्टर शर्मा से आज की अपॉइंटमेंट नहीं मिल सकती | आज उनकी दिनचर्या काफी वयस्त है | कल सुबह 10 बजे की है, आप कहें तो दे दूँ | ” शर्मा इंटरप्राइजेज की रिसेप्शनिस्ट के शब्द हर सुबह चाय की चुस्कियों के साथ कानों में गूँजने लगते हैं और मुझे मेरे अतीत की ओर ले जाते हैं , जहाँ मैंने अपने अपनी उम्र के 35 साल गुज़ारे | रिटायरमेंट के समय जब मैंने अंतिम बार अपने ऑफिस के बाहर आदित्य शर्मा की नेमप्लेट को देखा तो आँखें कुछ नम- सी हो गईं और वहाँ का दृश्य धुंधला-सा दिखाई देने लगा, लेकिन दिल में मेरे अतीत की छवि आइने की तरह आज भी बिलकुल साफ है |

पढ़ने-लिखने में मैं  बचपन से ही होशियार था | घर में कमाने वाला एक और हम खाने वाले नौ लोग थे | इसलिए परिस्थितियों से समझौता कर डॉक्टर बनने का अरमान सीने में दफन कर बैंक ऑफिसर के पद के लिए परीक्षा दी और उसमें अव्वल आ गया | इस तरह समझौते की नींव पर मेरी उम्र का दूसरा पड़ाव शुरू हुआ |काम में खुद को इतना मसरूफ कर दिया कि पता ही नहीं चला कब मैं एक साधारण आदित्य से शर्मा इंटरप्राइजेज का चेयरमैन मिस्टर आदित्य शर्मा में बदल गया | शायद ही कोई ऐसा दिन रहा हो जब मैं किसी मीटिंग या सेमीनार का हिस्सा न बना होऊँ या काम के सिलसिले में देश -विदेश दौरे पर न गया होऊँ | इतनी वयस्तता के बाद भी मैंने अपने परिवार को हमेशा प्राथमिकता दी | कभी  बच्चों को सिनेमा दिखाने ले जाना तो कभी किसी पाँच सितारा होटल में खाना खिलाना उनकी मेरी प्रति काफ़ी शिकायतों को दबा जाता था | हमारे दूर के एक रिश्तेदार थे , जो उस समय उम्र की उस दहलीज़ पर पर थे , जिस पर आज मैं खड़ा हूँ | मुझे आज भी वह शाम याद है, जब वे मुझसे मिलने आए और मैंने उन्हें खिड़की से देख लिया | रसोईघर में अपनी पत्नी से जाकर कहा यदि वे मेरे बारे में पूछे तो कह देना कि तबीयत कुछ नाजुक थी इसलिए दवाई खाकर आराम कर रहे हैं , क्योंकि अभी मेरा बिलकुल मन नहीं कर रहा कि मैं उनका बार-बार वही रिकॉर्ड सुनूँ, जो वे हर बार सुनाते हैं | वे तो सेवानिवृत्त हो आराम फरमाते हैं | पर यहाँ तो दो घड़ी फुरसत की निकालना भी दुर्लभ है | तभी अचानक दरवाज़े पर घंटी बजी और मैं अतीत के लंबे सफर से क्षणभर में लौट आया | दरवाज़े पर देखा तो माली खड़ा था | मुझे लगा कि चलो आधा घंटा तो कोई इन सुनसान दीवारों के अलावा मेरे साथ बातें करने वाला है | इधर वह धीरे -धीरे अपने काम को अंजाम देता जा रहा था औरे उधर मैं अपने सुख-दुःख उसके साथ बाँटते जा रहा था | उसका काम खत्म हो जाने पर मैंने दो कप चाय बनाई | जैसे ही उसे पीने के लिए भीतर बुलाया, वह बोला, “साहब आज बहुत काम है, तनिक एक खाली गिलास दे दीजिए, जल्दी से ठंडी करके पी लूँगा | वह जैसे-जैसे चाय ठंडी करते जा रहा था , वैसे-वैसे मेरे मन में फिर से तन्हाई नाम भरे तूफान का खौफ बढ़ता चला जा रहा था | क्या समय की मात थी, जब समय नहीं था किसी से बात करने का तो सब थे, अब समय है तो साथ नहीं। ……..