कल आज और कल के भँवर की मझदार में कौन गलत था

 

चंडीगढ़ (शालु चोपड़ा ) – माँ कहती है कि जब मैं उनके जीवन में आई तो सबके चेहरों पर ख़ुशी -सी छा गई थी | घर में प्रसन्नता की लहर दौड़ उठी थी | मैं सबकी इतनी लाडली थी कि मेरे चेहरे पर रोने के भाव उभरते ही दादू मुझे गोद में उठा पूरे घर -भर में घूमने लगते, तो कभी दादी मुझे खिलाने लगतीं | उनके झुर्रियों  से भरे चेहरे में एक अलग -सी चमक आ जाती थी | पापा के प्यार में भी कोई कमी नहीं थी | दिन में दो बार सुबह और शाम ऑफिस जाने से पहले और ऑफिस से आकर मेरे साथ समय बिताना उनके लिए किसी जन्नत से कम नहीं था | घर-बाहर ऑफिस के कामों से फुर्सत पा माँ भी मुझे अपने सीने से लगाती, तो उनकी दिन भर की थकान दूर हो जाती थी | सब मुझे इतना प्यार करते थे कि मेरा रोना एक पल के लिए भी किसी से देखा नहीं जाता था | समय धीरे-धीरे बीतता गया और देखते ही देखते तीन महीने गुज़र गए | मेरे तीन माह के होने पर दादा-दादी अपने खुले और हवादार घर में लौट गए | माँ को भी अब ऑफिस जाना था, क्योंकि उनकी मैटरनिटी छुट्टी की अवधि जो  समाप्त हो चुकी थी | मैं पहले की तरह आज भी दूध के लिए रो रही थी | जब बहुत कोशिशों के बाद भी चुप नहीं  हुई तो पापा ने मोबाइल पर एक गाना बजाकर मेरी ओर बढ़ा दिया | मैं एकदम चुप हो गई और टकटकी लगाए उसे देखने लगी | देखते ही देखते मैं बिना रोए सारा  दूध पी गई | धीरे-धीरे यह मेरे लिए नित्य क्रम -सा  बन गया था | अब जैसे ही मेरा रोना शुरू होता, तो मेरी ओर मोबाइल बढ़ा दिया जाता था | अब सबका काम आराम से होने लगा था  | यह सिलसिला तीन-चार महीने चला | अब मैं सात महीने की हो चुकी थी | माँ आज ऑफिस से थकी- माँदी लौटी थीं | मेरी राधा दीदी के घर जाने का समय हो गया था | उन्होंने माँ को चाय का एक कप दिया और मेरे लिए दाल का पानी और घर के लिए रवाना हो गईं | मैं बार-बार माँ से खेलने की गुहार करने लगी | कभी उनकी ओर देख ‘अबब’ कर रही थी तो कभी ‘मम’ की आवाजें निकाल रही थी | खेलने के जोश में पलंग पर लेटे हुए जोर-जोर से हाथ-पैर चला रही थी |  मुझे नहीं  मालूम था कि माँ और पापा  काम से थके-मांदे आए हैं | माँ ने सिरदर्द की गोली खाई, चाय की प्याली खत्म की , मुझे गोद में उठाया, खूब प्यार किया और फिर कल की मीटिंग की तैयारी में जुट गईं | अब बारी आई पापा की मुझसे खेलने की | इतने में उनका ज़रूरी ऑफिस का फ़ोन आ गया | इस बार उन्होंने मुझे टीवी के हवाले कर दिया , एक कार्टून लगाकर , अब वह भी बात करने में व्यस्त हो गए | मेरा खेलने का जोश धीरे-धीरे ठंडा  पड़ने लगा | लेकिन कार्टून देखने की जो आदत पड़ गई, अब वह छूटे नहीं छूट रही थी | अब तो मोबाइल फ़ोन और टीवी ने दादू के टहलाने, दादी के खिलाने, पापा के साथ मस्ती करने और माँ के सीने से लगकर सोने की जगह ले ली थी |मेरी दुनिया तो बस अब इन्हीं साधनों के इर्द-गिर्द घूमने लगी | जब कभी  इन उपकरणों  और मेरे बीच में कोई भी रूकावट आ  जाती थी तो मैं रो-रोकर  आसमान सर पर उठा लेती थी | अब मैं दो साल की ‘जिद्दी बच्ची’ का ख़िताब पा चुकी थी|

यहाँ क्या मैं गलत थी ?

आज के इस महंगाई भरे जीवन में पति-पत्नी दोनों का कमाना ज़रूरी होता जा रहा है | यदि वे अपने बच्चे को हर सुख-सुविधा के साधन उपलब्ध कराने चाहते हैं , अच्छी तालीम दिलाना चाहते हैं, समाज में एक प्रतिष्ठित स्थान दिलाना चाहते हैं, तो उन्हें दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह काम करना ही होगा | तभी तो आज के समाज में एक स्टैण्डर्ड कायम कर पाएँगे | फिर चाहे उनकी ज़िंदगी कितनी ही मशीनी क्यों न बन जाए | ऐसी ज़िंदगी में आपसी मेल-,मिलाप (सोशलाइज़ेशन) की तो कोई जगह ही नहीं है | जब वही सामाजिक रिश्तों को नहीं निभा पा रहे हैं , तो वे अपने बच्चे से कैसे उम्मीद करेंगे कि वह हर संबंध को बखूबी निभाने की कला सीखे | “हमारी झोली में खेलने के लिए एक गुड्डा या गुड़िया ले आओ , बच्चे को हम पाल लेंगे |” अभी अपने बच्चे को जीवन में लाने से पहले थोड़ी जमापूंजी करने के बारे में सोचा ही था कि बड़े-बुजुर्गों की यह इच्छा जाग  उठी | उनकी बातों का पालन यही सोचकर  किया गया कि चलो सब मिलजुलकर बच्चे की परवरिश करेंगे | उसे दादा-दादी से अच्छे संस्कार मिलेंगे | वे भी हमारी तरह दादी-नानी की कहानियाँ सुनकर बड़ा होगा | पर यह क्या अचानक से मुन्ना  के तीन-चार महीने का होने पर अब यह सुनने को मिलने लगा कि बच्चे की अच्छी परवरिश इस उम्र में  हमसे कहाँ हो पाएगी | कोई गिला , कोई शिकवा नहीं हैं अपने बुजुर्गों से, लेकिन यह प्रश्न ज़रूर जहन में बार-बार आता है कि क्या हम अभी इन जिम्मेदारियों को उठाने के लिए तैयार थे या फिर अपने बड़ों की खुशी के लिए यह कदम  उठाया | अब तो मुन्ने को राधा दीदी के हवाले कर नौकरी पर जाने के अलावा कोई रास्ता भी तो नहीं बचा था | धीरे-धीरे अपने मुन्ने के सुखद जीवन के लिए सुबह से रात तक भागदौड़ करने में भी आनंद आने लगा | पर इसी दौड़-धूप में उसके साथ बिताए गए यादगार और अनमोल पल कुछ छूट से से गए |

यहाँ क्या हम गलत थे ? क्या हमारी परवरिश और उम्मीदें गलत थीं ?

हमारे ज़माने में तो एक ही घर में सात-आठ बच्चे हुआ करते थे और कोई काम में हाथ बँटाने वाली राधा दीदी भी नहीं होती थी | सुबह-सुबह उठकर बच्चों के उठने से पहले सारे घर का काम करके, बच्चों की चाकरी में लग जाते थे | उन्हें पढ़ाया – लिखाया, इस काबिल बनाया कि आज कोई मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पद पर कार्यरत है तो कोई बैंक में जनरल मेनेजर बन गया है | फक्र होता है अपनी परवरिश पर |

लेकिन अब इन बूढी हड्डियों में इतनी जान नहीं रही कि अपने बच्चों के बच्चों को संभाल सकें, जबकि प्यार और दुलार में तो अपने बच्चों से भी ज्यादा इन्हें चाहते हैं | वह कहते हैं न कि मूल से ज्यादा ब्याज प्यारा होता है | पर शायद विचारों में तालमेल न बैठने के कारण हमारे पालन-पोषण का तरीका उन्हें समझ नहीं आया | हमने भी कोशिश तो दिलोजान से की पर, फिर भी कहीं कुछ कमी रह गई |

            तो यहाँ क्या हमारे प्यार में कोई कमी थी ?  क्या हम गलत थे ?

                मैं आप सबसे पूछती हूँ कि यहाँ कौन गलत था ?