क्या देव भी वर्तमान समय की तरह पौराणिक काल में क्वारंटाइन होते थे?

चंडीगढ़: अक्सर कई विद्वान चौमासे को लेकर आप तो चिंतित रहते ही है परंतु सारे समाज को कई बिंदुओं पर भ्रमित कर देते हैं। और आमजन पूछता रह जाता हैं कि क्या अब चार महीने के लिए शादियांे का लॉक डाउन आरंभ हो रहा है? मान्यता है कि इस चतुर्मास में विष्णु भगवान क्षीर सागर में निद्रा में चले जाते हैं और पृथ्वी पर इस दौरान कोई भी धार्मिक एवं विवाह जैसे शुभ कार्य वर्जित रहते हैं। इसे श्री विष्णु शयनोत्सव भी कहा जाता है।

क्या  पहली जुलाई की देवशयनी  से लेकर 25 नवंबर,2020 देवउठनी एकादशी , के मध्य , विवाहों का लॉक डाउन रहेगा  ? नहीं ! जानिये क्यों ?

परंतु मुहूर्त चिंतामणि तथा  पीयूषधारा जैसे ग्रंथों के अनुसार ,उत्तर भारत में , लोकमान्यता अनुसार विवाहादि के मुहूर्त स्वीकार किए गए हैं। अतः पहली जुताई से लेकर 25 नवंबर तक विवाह बंद नहीं होंगे न ही कोई मांगलिक कार्य वर्जित होंगे। हां !  केेवल श्राद्ध, आश्विन ,कार्तिक तथा पौष  महीनों के कुछ दिन छोड़ कर विवाह मुहूर्त प्रबल हैं। पहले हीे कोरोना तथा लॉकडाउन के कारण  जनसाधारण के अधिकांश कार्य रुके पड़े हैं इसी लिए हम यहां क्रियात्मक रुप से होने वाली धार्मिक परंपराओं के पौराणिक तथा आधुनिक संदर्भाें का विवेचन कर रहे हैं।

      यदि आपको किसी कारण विवाह का अनुकूल मुहूर्त नहीं मिल रहा है तो आप शुभ दिनों में किसी रविवार को चुन सकते हैं और दिन में अभिजीत मुहूर्त में लगभग दोपहर 12 बजे के आसपास पाणिग्रहण संस्कार, आनंद कारज आदि संपन्न कर सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अभिजीत मुहूर्त दिन का सर्वाधिक शुभ मुहूर्त माना जाता है। सामान्यत: यह 40 मिनट का होता है। अभिजीत मुहूर्त  सुबह 11:40 से 12:20 बजे के बीच होगा । यदि अभिजीत मुहूर्त में पूजन कर कोई भी शुभ मनोकामना की जाए तो वह निश्चित रूप से पूरी होती है। नारदपुराण के अनुसार अभिजीत मुहूर्त यात्रा या शुभ काम के लिए घर से निकलने का शुभ काल होता है। अभिजीत मुहूर्त के दौरान दक्षिण दिशा में यात्रा नहीं करनी चाहिए।

क्या देव भी वर्तमान समय की तरह पौराणिक काल में क्वारंटाइन होते थे ?

हमारे देश में भगवान भी बीमार होते हैं और उनकी भी चिकित्सा की जाती है। ज्येष्ठ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ को ठंडे जल से स्नान कराया जाता है। इस स्नान के बाद भगवान को ज्वर (बुखार) आ जाता है। 15 दिनों तक भगवान जगन्नाथ को एकांत में एक विशेष कक्ष में रखा जाता है। जहां केवल उनके वैद्य और निजी सेवक ही उनके दर्शन कर सकते हैं। इसे अनवसर कहा जाता है।

देवताओं का यह 4 महीने का शयनकाल , वर्तमान समय का क्वारंटाइन जैसा ही लग रहा है।

हरिशयनी एकादशी, देवशयनी एकादशी, पद्मा एकादशी, पद्मनाभा एकादशी नाम से पुकारी जाने वाली एकादशी इस वर्ष 1 जुलाई  को आ रही है। इस दिन से गृहस्थ लोगों के लिए चातुर्मास नियम प्रारंभ हो जाते हैं।देवशयनी एकादशी नाम से ही स्पष्ट है कि इस दिन श्रीहरि शयन करने चले जाते हैं। इस अवधि में श्रीहरि पाताल के राजा बलि के यहां चार मास निवास करते हैं।

चातुर्मास असल में संन्यासियों द्वारा समाज को मार्गदर्शन करने का समय है। आम आदमी इन चार महीनों में अगर केवल सत्य ही बोले तो भी उसे अपने अंदर आध्यात्मिक प्रकाश नजर आएगा।इन चार मासों में कोई भी मंगल कार्य- जैसे विवाह, नवीन गृहप्रवेश आदि नहीं किया जाता है।

 2020 में देवउठनी एकादशी 25 नवंबर, 2020 (बुधवार) को है ?

ऐसा क्यों? तो इसके पीछे सिर्फ यही कारण है कि आप पूरी तरह से ईश्वर की भक्ति में डूबे रहें, सिर्फ ईश्वर की पूजा-अर्चना करें। बदलते मौसम में जब शरीर में रोगों का मुकाबला करने की क्षमता यानी प्रतिरोधक शक्ति बेहद कम होती है, तब आध्यात्मिक शक्ति प्राप्ति के लिए व्रत करना, उपवास रखना और ईश्वर की आराधना करना बेहद लाभदायक माना जाता है।

 वास्तव में यह वे दिन होते हैं जब चारों तरफ नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ने लगता है और शुभ शक्तियां कमजोर पड़ने लगती हैं ऐसे में जरूरी होता है कि देव पूजन द्वारा शुभ शक्तियों को जाग्रत रखा जाए। देवप्रबोधिनी एकादशी से देवता के उठने के साथ ही शुभ शक्तियां प्रभावी हो जाती हैं और नकारात्मक शक्तियां क्षीण होने लगती हैं।

देवशयनी एकादशी के चार माह के बाद भगवान् विष्णु प्रबोधिनी एकादशी के दिन जागतें हैं। देवशयनी एकादशी प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा के तुरन्त बाद आती है और अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत जून अथवा जुलाई के महीने में आता है। चतुर्मास जो कि हिन्दु कैलेण्डर के अनुसार चार महीने का आत्मसंयम काल है, देवशयनी एकादशी से प्रारम्भ हो जाता है।

एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।

भगवान विष्णु का प्यार और स्नेह के इच्छुक परम भक्तों को दोनों दिन एकादशी व्रत करने की सलाह दी जाती है।

देवशयनी एकादशी बुधवार, जुलाई 1, 2020 को

एकादशी तिथि प्रारम्भ – जून 30, 2020 को 07:49   बजे सायं

एकादशी तिथि समाप्त – जुलाई 01, 2020 को 05:29   बजे सायं

2 जुलाई को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय- 05:24 प्रातः से प्रातः08:13 बजे 

पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय – 03:16  बजे सायं

देवशयनी एकादशी पूजा विधि

देवशयनी एकादशी व्रत की शुरुआत दशमी तिथि की रात्रि से ही हो जाती है. दशमी तिथि की रात्रि के भोजन में नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए. अगले दिन प्रात: काल उठकर देनिक कार्यों से निवृत होकर व्रत का संकल्प करें भगवान विष्णु की प्रतिमा को आसन पर आसीन कर उनका षोडशोपचार सहित पूजन करना चाहिए.  पंचामृत से स्नान करवाकर, तत्पश्चात भगवान की धूप, दीप, पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए.  भगवान को ताम्बूल, पुंगीफल अर्पित करने के बाद मन्त्र द्वारा स्तुति की जानी चाहिए. इसके अतिरिक्त शास्त्रों में व्रत के जो सामान्य नियम बताये गए है, उनका सख्ती से पालन करना चाहिए.

इस व्रत को करने से समस्त रखते वाले व्यक्ति को अपने चित, इंद्रियों, आहार और व्यवहार पर संयम रखना होता है. एकादशी व्रत का उपवास व्यक्ति को अर्थ-काम से ऊपर उठकर मोक्ष और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है.

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