नए दौर की परीक्षा पर चरचा: मदन गुप्ता

चंडीगढ़: अब तो हर छोटी सी बात पर भी चर्चा का रिवाज़ सा हो गया है। चाय हो या पकौड़ा । संसद हो या सड़क , कुछ न कुछ चर्चा चलती रहती है। चाय पर ही नहीं उसकी पत्ती पर भी चर्चा ! जब ग्रीन टी की चर्चा चलती है तो दूर तलक ही नहीं बल्कि उसकी जड़ तक घुस जाती है यानी बात केवल चीनी तक ही नहीं रह जाती बल्कि चीन के अंदर घुस जाती हेै जहां से चाय की पत्ती कभी आई थी और 2020 में एक और समस्या वहां से बिना इंम्पोर्ट डयूटी पे किए, निशुल्क  आयात हो गई ।     

आजकल कई विषयों पर चर्चाएं चल रही हैं। गांव के नुक्क्ड़ों से लेकर टी .वी के चैनलों के  पैनलों तक। देश के नागरिक कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। फिर भी गरजते बादलों में सिल्वर लाइनें ढूंढने वाले अपनी काम की चीज ढूंढ ही लेते हैं।

हमारे समय जब एग्जाम होते थे तो हमारे एक महीना पहले से ही तोते उड़े होते थे।एग्जामिनेशन फीवर एक महीने पहले से ही शुरु हो जाता।न खाना अच्छा लगता था न इधर उधर ताकना झांकना । यानी रिजल्ट आने तक टोटल लॉक डाउन! कई बार इंज्ैाक्शन लगवा कर भी पेपर दिए।रिजल्ट के बाद छित्तर परेड की संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता था। युनिवर्सिटी में हमारे एक पढ़ाकू मित्र फाईनल एग्जाम में पढ़ने के उदद्ेश्य से नींद न आने की गोलियां खाते थे। जिस दिन लास्ट पेपर था उस दिन आंख लग गई और पूरा साल चौपट हो गया।

आज स्टुडेंट केयर फ्री हैं। हम तो पेपर देकर आते तो पहले सेल्फ असेेस्मेंट कर के खुद ही नंबर जोड़ लेते। फिर मास्टर जी पूछते… क्या किया …क्या छूटा ? उसके बाद घर वाले लाइन हाजिर कर के पूछते कौन से सवाल किए कौन से क्यों नहीं किए।

वक्त बदला। पिछले साल तक पेरेन्ट्स इसी चिन्ता में रहते थे कि पप्पू के 99.9 परसेंट क्यों आए ? सुअर का बच्चा एक परसेंट कहां कटा आया ? या माएं अपने साहबजादों को लताड़ती- शर्माईन के लफंडर छोरे के बिना टयूशन के 99 परसेंट मार्क्स आए हैं और तूने अपने प्रिंसीपल बाप की सारे स्कूल में नाक कटवा दी!
बच्चे खुश हैं। स्कूल बंद हैं। नो एग्जाम नो टेंशन। उनकी ख्वाहिश है कि चुनावों की तरह इम्तिहान भी पांच साल बाद ही होने चाहिए। पोस्ट ग्रेज्युएशन बैठे ठाले ही हो जाए।  जैसे ज्योतिषियों की एक जमात को घर बैठे ही डाक्टरेट की डिग्री और गोल्ड मेडल 3100 रुपये में मिल जाती है और वे भी अपने विज्ञापन में बड़ी शान से लिखते हैं डाक्टर फलां फलां ,17 बार गोल्ड मेडलिस्ट। आपने भी ऐसे विज्ञापन देखे होंगे- मिडल फेल हमारी युनीवर्सिटी से बी.ए पास करंे। हिमाचल में तो बिना युनीवर्सिटी के ही देश के होनहार बच्चे इंजीनियर की डिग्रियां लिए घूम रहे हैं।
प्रधान मंत्री के एक एग्जाम सैशन के बाद आशाएं मजबूत हुई हैं कि अब वह दिन दूर नहीं जब  बिना पेपर दिए ही  हमारे होनहार बच्चे एक दिन, घर बैठे ही इंजीनियर या डाक्टर बन जाएंगे। ऐसा ही सुखद वातावरण रहा तो आई .ए. एस के पद भी घर घर पहुंचा दिए जाएंगे। वर्क फ्राम होम के बाद डिग्री और नौकरी एट युअर होम।
सबसे बड़ा रिलीफ तो परीक्षार्थियों को यह मिल रहा है कि पर्चियां बनाने का झंझट खत्म। उन्हें छुपाने की  के लिए गुप्त स्थानों को ढूंढने की टेंशन ओवर। नकल के लिए ब्लू टुथ के लिए नेटवर्क का टंटा खत्म। अभिभावकों को एक ही डॉयलाग- बेटा पढ़ लो ….पढ़ लो… रटने से निजात मिली। अब पढ़ो न पढ़ो सब मेरिट में पास। गधे घोड़े सब  खाएं च्यवनप्राश। प्राईवेट इंस्टीच्यूट जो  अखबारों में अपने यहां पढ़ने वाले आठवीं  क्लास के बच्चों के फोटो और अंकों सहित बड़े बड़े विज्ञापन देते नहीं थकते थे और हमारे यहां एडमिशन करवाओ का लालच देते थे, उनका धंधा चौपट हो गया, अखबारों को धक्का लगा।
वैसे हर कदम पर इम्तिहान लेती है जिन्दगी। पेपर लीक करवाने वालों का भी फुलटाइम धंधा चौपट। ऑन लाइन पेपर से पेपर की बचत। मोबाइल फोनों , टैब्स, लैपटॉप की बिक्री में सोने की तरह उछाल यानी इम्तिहान न हों तो हर रोज , परीक्षार्थियों के दिलों में होली  दिवाली जैसी खुशी का एहसास…! यानी सर्दी में गर्मी का एहसास।