रफ़्तार…….समय की गति के साथ बहते गए………कवित्री: सरगुन बबूता

रफ़्तार

 समय की गति के साथ बहते गए , हो रहे परिवर्तन के साथ रफ्तार अपनी मिलाते गए

इस रफ्तार से चलते कब पीछे रह गए, इस सच से तन्हा हम सब रह गए।।

 

अब जैसे  समय भी भागता -२ थकसा गया , रफ्तार थाम ज़रा सा आराम करने जो  बैठ गया ,

हलचल थमी है जो आज , लम्हां रुका है तो आज , दुनिया की भीड़ में अलग, अपने से ही तारुफ़ हो गया ।।

 

नींद जगी अपने बचपन की यादों की परवाज़ से, सुबह -२ चिड़िया के चहकने की आवाज़ से ,

वहीं ठंडी महकती सुबह जैसे बचपन में छत पर जगने पर होती, वहीं शिखर दोपहरी जो सहेलियों के साथ गीटे  खेलते समय   होती ।।

 

गर्मियों की छुट्टियों में छत पर बैठ, भाई बहनों के साथ आते जाते स्कूटर कार गिनना

बीस तक की गिनती में जीतना और शर्त में लगे काचों को हारने वाले से छीनना |

भरी दोपहर माँ के सोने पर दबे पांव देवड़ी में स्टापू खेलना,  और जरा सी आहट पा भागकर सोने का नाटक करना।

 

सब कुछ भूल गए थे हम, गली में पापड़ वाले की टन -टन, हाथी की सवारी वाले की छन छन,

वो बचपन में बड़े होकर पूरे होने वाले ख़्वाब, आबू  छळी व् तीले वाली कुल्फी का स्वाद ।

 

आज फिर वैसे ही सुबह, दोपहर, शाम और रात आती है, पिछले मोहल्ले वाले घर से बातो की आवाज आती है|

आंगन में लगे पेड़ पर कोयल की बोली मिश्री घोलती है , पतो पर चिड़िया, तोता, मैना बेफिक्री से झूलती है ||

 

दूर से गाडी की गूंज खामोशी तोड़ती है आज , अपनी साँसों की आवाज दिल की धड़कन साफ़ सुनती है आज|

अब जाकर ज़िन्दगी की राज समझ आई, यह रफ्तार हमको नहीं रास आई||

 

हमने खुद ही अपना ये क्या हाल कर लिया, अपना ही नहीं इस धरा को भी बेहाल कर  दिया|

माँ प्रकृति के गोद को पेड़ो से वंचित कर दिया

उसकी कोख को उसके अन्य प्रिय जनों  से सूनी कर  दिया ||

 

अब तो संभल जा इंसान प्रकृति ने यह संदेश भेजा है, इस कहर के रूप में हमारे  ही कर्मो का फल भेजा है|

रुक जा मत कर  हरी सम्पदा को सीमेंट की बस्तियों में तब्दील

इन्ही में दुबक कर मर जाएगा, प्रकृति की ममता से वंचित हो जाएगा ||

 

करले अपनी रफ्तार धीमी नहीं तो इसी में लुप्त हो जाएगा, कभी इंसान भी थे धरती पर, इतिहास एवं भूगोल का पाठ बनकर रह जाएगा||

 

 

—-  कवित्री —

 

 

सरगुन बबूता

पूर्व प्रधानचर्या – सॉपिंस स्कूल, पंचकूला

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