हरियाणा ग्रंथ अकादमी व ग्रामोदय के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित ऑनलाइन काव्य  गोष्ठी “लॉक डाउन : मृत्योर्मा अमृतं गमय”

पंचकूला ।  कोरोना रूपी महामारी के रूप में हमारे सामने खड़ी समस्या में लॉक डाउन एक प्रमुख अस्त्र है। लॉक डाउन मृत्यु की स्थिति से जीवन की स्थिति में पहुंचने का मार्ग सिद्ध हो रहा है और मृतयोर्मा अमृतं गमय की उक्ति को चरितार्थ कर रहा है। यह उद्गार हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने ग्रंथ अकादमी व ग्रामोदय के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित ऑनलाइन काव्य  गोष्ठी “लॉक डाउन : मृत्योर्मा अमृतं गमय” में बतौर अध्यक्ष प्रकट किए।

इस ऑनलाइन कवि सम्मेलन में ट्राइसिटी के अलावा देश व प्रदेश के कई जाने-माने कवि और कवत्रियों ने हिस्सा लिया। ऑनलाइन काव्य गोष्ठी  में लॉक डाउन के दौरान घर में बैठे हुए सभी जन को प्रोत्साहित करने हेतु सभी ने अपनी अपनी रचनाओं के माध्यम से जागरूकता के साथ-साथ सभी को उत्साहित किया। श्री वीरेंद्र चौहान जी ने बताया कि सप्ताह में दो दिन वीरवार व रविवार को इस तरह की काव्य गोष्ठियों का आयोजन किया जाता है जो कि फेसबुक पर लाइव भी होती है। सभी लोग उसको देखते हैं और इस कार्यक्रम को बहुत पसंद भी कर रहे हैं। सभी लोग अपने अपने कमेंट व विचार काव्य गोष्ठी के दौरान सभी से सांझा भी करते हैं । इस प्रक्रिया में कोई भी व्यक्ति उनकी ऑनलाइन लिंक पर जाकर जुड़ सकता है।

इसके साथ-साथ उन्होंने कोरोना वायरस से बचने के लिये पुलिस व प्रशासन का सहयोग देने हेतु देशवासियों का धन्यवाद करते हुए सभी को अभी घर पर रहने की अपील की है और आगे भी पुलिस व प्रशासन का सहयोग करते हुए संयम बरतने को कहा है। आज की काव्य गोष्ठी में भाग लेने वाले रचनाकारों के नाम हैं डॉ. अशोक बत्रा, राशि श्रीवास्तव , नीलम त्रिखा  मुसाफिर,  रेणुका चुघ, नरेन्द्र आहूजा ‘विवेक’,  कैलाश सोनी ,आरती, सविता गर्ग, अश्वनी शांडिल्य  आदि रचनाकारों ने अपनी अपनी कविताएं सुनाई ।

कवि सम्मेलन का संचालन कवयित्री प्रतिभा  ‘माही’ ने किया। अपनी कविता के माध्यम से ग्रंथ अकादमी उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने लोगों को घर में ही ठहरे रहने के लिए समझाते हुए कहा कि –
दुनिया के विद्वान कहें
ज्ञानी साइंसदान कहें
दो गज सबसे दूर रहें
वायरस से बचना है तो
संकट में हैं है भूमंडल
घुटनों पर आ गए सबल
चूक न कर न रेम्बो बन
घर से साथी नहीं निकल

सोनीपत से कॉन्फ्रेंसिंग में पधारे मूर्धन्य कवि डॉ. अशोक बत्रा ने महाभारत से दृष्टांत ले अत्यंत सुंदर शब्दों लॉक डाउन का पालन करने की शिक्षा का प्रसार किया –
लाक्षा गृह सा जग हुआ, और लगी है आग
चूहे सा बिल में दुबक , जाग बावरे जाग
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कुछ दिन रह लो द्वारिका, मत खेलो फुटबॉल
वरना क्या देखा नहीं , इटली वाला हाल
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ऐसी ना उम्मीद थी , तुमसे हमें वुहान
ये तुमने क्या कर दिया सारा जग शमशान
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हर विपदा में आगे बढकर, ले लेता जो गोदी में
यह एहसास कहीं ना देखा , जो देखा है मोदी में
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कवि सम्मेलन संचालिका प्रतिभा ‘माही’ ने लॉक डाउन की महत्ता का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया –
लॉकडाउन की महत्ता देखो , इसने देश बचाया है -2
छोड़ बुराई व्यसन सभी ने, आध्यात्म अपनाया है-2
कलियुग भी सतयुग सा होगा..2
थोड़ा धीर धरो —
मेरे देश प्रेमियो…मेरे देश वसियो…
थोड़ा सा धीर धरो…
थोड़ा सा धीर धरो…औरों की पीर हरो..2
मेरे देश प्रेमियो…मेरे देश वसियो…थोड़ा सा धीर धरो…

कवयित्री सविता गर्ग ‘सावी’ ने सुमधुर स्वर में अपनी रचना प्रस्तुत की –
फागण आया रंग रंगीला
रुक्का पड़ रया भारी
हरियाणे मैं होली खेलण
आये कृष्ण मुरारी।

कवयित्री नीलम त्रिखा ने काव्य – पाठ में पढ़ा कि –
झूठा अभिमान छोड़ दे झूठा यह अभिमान सजा ले होठों पर मुस्कान
मुस्कान हर उलझन सुलझाए कितने गहरे जख्म मिटाए

लॉक डाउन में प्रकृति में हो रहे चमत्कारों का वर्णन करते हुए कवयित्री रेणुका चुघ ने कहा –
कैसा ये चमत्कार हुआ…
” प्रकृति जागी है …
जागा है … फिर से अंबर ,
शुभ ऊर्जा का संचार हुआ
मानव मन जुड़े स्वयं से
देखो , कैसा चमत्कार हुआ”

कवयित्री आरती लॉकडाउन के संदर्भ में अत्यंत भावुक प्रस्तुति दी –
हे मानव तुझे तो लॉकडाउन भाता था
हर प्राणी को बन्धन में बांधना अता था
फिर अब क्यों कुछ ही दिन में अकुताया है
अब क्यों इस लॉकडॉउन को कैद बतलाया है

कवि मुसव्विर फ़िरोज़पुरी ने अत्यंत सुंदर दोहे प्रस्तुत किए –
इस जंगल से छूट कर, देखा पी का गांव।
ऐसे   भागी  बांवरी,   पीछे   छूटे   पांव।।
माला मन को खोजती, ख़ुशबू  ढ़ूढे  फ़ूल।
चन्दन माथा ढूंढता, जो उसके अनुकूल।।

कवयित्री राशि श्रीवास्तव ने लॉक डाउन और रिश्तों को लेकर बहुत सुन्दर रचना प्रस्तुत की –
लॉकडाउन तो हुआ है लेकिन, खुल गया रिश्तों का ताला I
मरे पड़े एहसासों को, फ़िर से जीवित कर डाला II

नरेन्द्र आहूजा विवेक ने निजामुद्दीन मरकज प्रकरण को अपने  दोहे में कुछ यूँ समेटा – खुदा मरकज में रहता, करते ये प्रचार भर भीड़ भरपूर यहाँ , किये सब बीमार